| उपन्यास सम्राट पे्रमचंद द्वारा स्थापित और संपादित हंस अपने समय की अत्यन्त महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। महात्मा गांधी और कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी दो वर्ष तक हंस के सम्पादक मंडल में रहे। मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु के बाद हंस का संपादन उनके पुत्र प्रसिद्ध कथाकार अमृतराय ने किया। इधर अनेक वर्षों से हंस का प्रकाशन बंद था।
मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन यानी ३१ जुलाई १९८६ से अक्षर प्रकाशन ने प्रसिद्ध कथाकार राजेन्द्र यादव के सम्पादन में हंस को एक कथा मासिक के रूप में फिर से प्रकाशित किया। आज हंस की उम्र २३ वर्ष है।
हंस कथा मासिक एक शालीन, सांस्कृतिक, साहित्यिक और विचारशील पत्रिका है। हमारा अनुभव है कि आज की चालू पत्रिकाओं से खिन्न और निराश पाठक, जिसकी एक बहुत बड़ी संख्या हमारे समाज में है, इसकी हर माह प्रतीक्षा करता है।
हंस कथा मासिक में आठ से दस तक देशी-विदेशी साहित्यिक व रोचक कहानियों के अतिरिक्त हर बार किसी प्रसिद्ध कथाकार की एक विशिष्ट कहानी भी होती है। कहानी प्रधान होने के बावजूद इसमें साक्षात्कार, नाटक, फिल्म, टी०वी०चैनल, राजनीति, कला-संगीत आदि से संबंधित नियमित गम्भीर, रोचक और विचारोत्तेजक स्तम्भ भी होते हैं। अन्य विषयों पर भी विचारपरक सामग्री इसमें निरन्तर प्रकाशित होती रहती है। ÷हंस' की प्रसिद्धि अपनी वैचारिक बहसों और अछूते विषयों पर बहस के लिए भी उतनी ही है जितनी उत्तेजक संपादकीयों के लिए। कहना ग़लत नहीं होगा कि ÷हंस' का एक बहुत बड़ा पाठकवर्ग सिर्फ संपादकीयों के लिए ही पत्रिका पढ़ता और प्रतिक्रियाएं देता है.
यह पत्रिका सुविधाजनक डबल डिमाई साईज(१०.५ ८) में है। पत्रिका के आवरण पर रंगीन पारदर्शी द्वारा देश के प्रसिद्ध चित्रकारों और फोटोग्राफरों की कलाकृतियां प्रस्तुत की जाती है। १०० पृष्ठों की यह पत्रिका ग्लेज्ड पेपर पर २५ रूपये की है।
आज हंस अपनी वैचारिक तेजस्विता के कारण भारत की सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका के रूप में पहचानी जाती है। कहा जा सकता है कि हंस सिर्फ एक पत्रिका ही नहीं, परिवर्तनकामी रचनाओं और विचारों का एक जीवंत मंच और आंदोलन दोनों है।
आइए, आप भी इस अभियान में अपना योगदान दीजिए। |